जमुई : बुधवार को कचहरी चौक पर राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के कार्यकर्ताओं
ने धरना दिया। जिसकी अध्यक्षता पार्टी के जिलाध्यक्ष अरुण कुमार ने की। इस
मौके पर वक्ताओं ने सारण की घटना को लेकर सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाते
हुए निंदा की। बाद में धरना पर बैठे सदस्यों ने मृत बच्चों को श्रद्धांजलि
देते हुए दो मिनट का मौन रखा। धरना में अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के प्रदेश
सचिव मु. बुलंद अख्तर, मुरारी मंडल, राजेन्द्र महतो, रामवृक्ष महतो, प्रमोद
मंडल, रविन्द्र मंडल, आस्तिक पासवान, बबलू सिन्हा, रामप्रताप साह, अमित
सिन्हा, मु. असगर मलिक, सोनू मलिक सहित कई कार्यकर्ता मौजूद थे।
Saturday, July 27, 2013
लोक समता पार्टी ने किया विरोध प्रदर्शन
बांका : राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के कार्यकत्र्ताओं ने मशरक मिड डे मील
घटना के विरोध में बुधवार को काली पट्टी लगाकर विरोध प्रदर्शन किया। साथ ही
समाहरणालय पर कार्यकर्ताओं ने धरना दिया। जिलाध्यक्ष डॉ.विनय प्रसाद व
मीडिया प्रभारी सुनील कृष्णज ने बताया कि राजगीर चिंतन शिविर में राष्ट्रीय
अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के आह्वान पर यह आंदोलन किया गया। सितंबर महीने
के पहले सप्ताह में पार्टी का जिला सम्मेलन बांका में होगा। इसकी तैयारी के
लिए जनसंपर्क किया जा रहा है। आंदोलन में मुनीलाल कुशवाहा, कैलाश कामती,
शिवशंकर पंजियारा, विमला देवी, सुरेश रजक, बालगोविंद मडल, पंकज कापरी, दशरथ
वर्मा, राजीव पंजियारा, नाबीव हुसैन आदि शामिल हुए।
राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने दिया धरना
बेतिया,
: चार सूत्री मांगों को लेकर राष्ट्रीय लोक समता पार्टी की पश्चिम चम्पारण जिला इकाई ने गुरुवार को समाहरणालय के मुख्य द्वार एक दिवसीय धरना दिया। नाराज पार्टी के समर्थकों ने बेतिया के प्रस्तावित मेडिकल कालेज को अन्य जिला में हस्तांतरित करने के किसी प्रयास का जमकर विरोध किया। वे बगहा के नौरंगिया गोली कांड के मृतकों के आश्रितों को दस लाख मुआवजा देने की भी मांग कर रहे थे। बाद में पार्टी का एक शिष्टमंडल महामहिम राज्यपाल को जिलाधिकारी श्रीधर सी. के माध्यम से एक ज्ञापन सौंपा। उसमें मृत परिवार के आश्रितों को सरकारी नौकरी देने, गोलीकांड के घायलों को एक लाख मुआवजा राशि देने की मांग प्रमुख है। शिष्टमंडल में अति पिछड़ा प्रकोष्ठ के प्रदेश उपाध्यक्ष दारोगा प्रसाद, जिला उपाध्यक्ष मुखलाल महतो, मोहम्मद सगिर, राजेश कुमार गुप्ता, केदार शास्त्री, नथू चौधरी, नवल किशोर कुशवाहा, लक्ष्मण प्रसाद, नरेन्द्र कुमार यादव आदि शामिल थे।
: चार सूत्री मांगों को लेकर राष्ट्रीय लोक समता पार्टी की पश्चिम चम्पारण जिला इकाई ने गुरुवार को समाहरणालय के मुख्य द्वार एक दिवसीय धरना दिया। नाराज पार्टी के समर्थकों ने बेतिया के प्रस्तावित मेडिकल कालेज को अन्य जिला में हस्तांतरित करने के किसी प्रयास का जमकर विरोध किया। वे बगहा के नौरंगिया गोली कांड के मृतकों के आश्रितों को दस लाख मुआवजा देने की भी मांग कर रहे थे। बाद में पार्टी का एक शिष्टमंडल महामहिम राज्यपाल को जिलाधिकारी श्रीधर सी. के माध्यम से एक ज्ञापन सौंपा। उसमें मृत परिवार के आश्रितों को सरकारी नौकरी देने, गोलीकांड के घायलों को एक लाख मुआवजा राशि देने की मांग प्रमुख है। शिष्टमंडल में अति पिछड़ा प्रकोष्ठ के प्रदेश उपाध्यक्ष दारोगा प्रसाद, जिला उपाध्यक्ष मुखलाल महतो, मोहम्मद सगिर, राजेश कुमार गुप्ता, केदार शास्त्री, नथू चौधरी, नवल किशोर कुशवाहा, लक्ष्मण प्रसाद, नरेन्द्र कुमार यादव आदि शामिल थे।
राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का धरना
बिहार में बढ़ते अपराध को नियंत्रित करने में कथित रूप से विफल हो चुकी
सरकार के खिलाफ राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के बैनर तले बुधवार को जिला
समाहर्ता भोजपुर के समक्ष एक दिवसीय धरना का आयोजन किया गया।
धरना को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने छपरा में विषाक्त मध्याह्न भोजन लेने से 23 बच्चों की मौत, औरंगाबाद में नक्सलियों द्वारा पुलिस राइफल लूटने, बेगूसराय में छात्रा की गोली मारकर हत्या, नासरीगंज में दो बच्चों की हत्या, बगहा पुलिस फायरिंग में गरीबों की हत्या जैसी घटनाओं के लिए नीतीश सरकार को जिम्मेदार बताया। साथ ही कृषि संकट से जूझ रहे शाहाबाद के किसानों की प्रमुख समस्या सिंचाई पर भी चर्चा की।
कार्यक्रम की अध्यक्षता पार्टी के जिलाध्यक्ष प्रवीण सिंह ने एवं संचालन अनिल कुमार राय ने किया। इस मौके पर पार्टी के प्रदेश महासचिव विजय बहादुर, शंकर तिवारी, अशोक कुशवाहा, परमात्मा सिंह,पिंटू, सरिता श्रीवास्तव, सत्यदेव सिंह,कामेश्वर पांडेय, हरिशंकर ओझा,निल्लू श्रीवास्तव, प्रमोद चौधरी, माना पांडेय, डा. संजय यादव, संजय सिंह, डा. हरेन्द्र सिंह तोमर, सुधीर श्रीवास्तव, कामेश्वर कुशवाहा, संतोष श्रीवास्तव, रणधीर कुमार कुशवाहा,सविता देवी, धनरावती देवी, सरस्वती देवी, मिथिलेश चंद्रवंशी उपस्थित थे।
धरना को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने छपरा में विषाक्त मध्याह्न भोजन लेने से 23 बच्चों की मौत, औरंगाबाद में नक्सलियों द्वारा पुलिस राइफल लूटने, बेगूसराय में छात्रा की गोली मारकर हत्या, नासरीगंज में दो बच्चों की हत्या, बगहा पुलिस फायरिंग में गरीबों की हत्या जैसी घटनाओं के लिए नीतीश सरकार को जिम्मेदार बताया। साथ ही कृषि संकट से जूझ रहे शाहाबाद के किसानों की प्रमुख समस्या सिंचाई पर भी चर्चा की।
कार्यक्रम की अध्यक्षता पार्टी के जिलाध्यक्ष प्रवीण सिंह ने एवं संचालन अनिल कुमार राय ने किया। इस मौके पर पार्टी के प्रदेश महासचिव विजय बहादुर, शंकर तिवारी, अशोक कुशवाहा, परमात्मा सिंह,पिंटू, सरिता श्रीवास्तव, सत्यदेव सिंह,कामेश्वर पांडेय, हरिशंकर ओझा,निल्लू श्रीवास्तव, प्रमोद चौधरी, माना पांडेय, डा. संजय यादव, संजय सिंह, डा. हरेन्द्र सिंह तोमर, सुधीर श्रीवास्तव, कामेश्वर कुशवाहा, संतोष श्रीवास्तव, रणधीर कुमार कुशवाहा,सविता देवी, धनरावती देवी, सरस्वती देवी, मिथिलेश चंद्रवंशी उपस्थित थे।
Tuesday, March 12, 2013
नीतीश के खिलाफ लामबंदी तेज
फ़ज़ल इमाम मल्लिक
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की चौतरफा घेरेबंदी शुरू हो गई है। एक तरफ सहयोगी भाजपा नरेंद्र मोदी के सवाल पर उनके साथ कोई समझौता करने के मूड में नहीं लगती तो दूसरी तरफ ठेका शिक्षकों पर पुलिसिया लाठी चार्ज के मामले में उन्हें सुप्रीम कोर्ट को सफाई देनी पड़ रही है। विरोधी दल तो इस मुद्दे को भुनाने का प्रयास कर ही रहे हैं। पिछड़ी कुर्मी जाति के नीतीश के वोटबैंक में सेंध लगाने की कोशिश में अब उपेंद्र कुशवाहा भी जुट गए हैं। कुशवाहा जद (एकी) के राज्यसभा सदस्य थे। लेकिन पिछले दिनों नीतीश पर अधिनायकवाद का आरोप लगा उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता और जद (एकी) दोनों से नाता तोड़ लिया। कुशवाहा ने अपनी अलग राष्ट्रीय लोक समता पार्टी भी बना ली है।
नियोजित व वित रहित शिक्षकों के प्रदर्शन और पुलिसिया दमन से आलोचना में घिरे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की परेशानी कम होने का नाम नहीं ले रही है। इन सब के बीच उनके कई पुराने साथियों ने उनका साथ छोड़ कर उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। सिर्फ साथ छोड़ते तो नीतीश कुमार की परेशानी नहीं बढ़ती लेकिन दो महीने पहले तक जद (एकी) के सांसद रहे उपेंद्र कुशवाहा ने नई पार्टी का एलान कर नीतीश कुमार को संकट में डाल दिया है। नीतीश पिछड़ों की राजनीति करते हैं और उपेंद्र भी पिछड़ी जाति कोयरी से आते हैं। बिहार में उनकी आबादी तकरीबन बारह फीसद है और यह तादाद कुशवाह की राजनीतिक जमीन के लिए काफी है। उनकी जाति के लोग उनके पीछे खड़े हैं क्योंकि उन्हें लगने लगा है कि उपेंद्र को नीतीश ने छला है। इसकी एक बड़ी वजह उपेंद्र कुशावहा का पार्टी और राज्यसभा की सदस्यता से त्यागपत्र भी है। उनका कार्यकाल करीब चार साल बाकी था और वे चाहते तो खामोशी के साथ सत्ता का सुख भोग सकते थे। लेकिन नीतीश की तानाशाही की वजह से उन्होंने सत्ता का मौह त्याग कर नए सिरे से संघर्ष का रास्ता चुना। यह भी सही है कि दो बार पहले भी वे नीतीश का साथ छोड़ कर गए थे लेकिन बाद में फिर उनके साथ हो लिए। लेकिन इस बार वे आरपार की लड़ाई के मूड में हैं। उपेंद्र कुशवाहा ने तीन मार्च को पटना के गांधी मैदान में बड़ी रैली की जिसमें बिहार के हर जिले से लोग आए थे। रैली में करीब दो लाख लोगों की शिरकत से कुशवाहा उत्साहित हैं। इसकी एक वजह तो यह भी है कि बीते साल नवंबर में जद (एकी) की अधिकार रैली में इतनी भीड़ नहीं जुट पाई थी, जबकि सरकार ने लोगों को लाने के लिए हर तरह की सुविधा मुहैया कराई थी। नए बने राष्ट्रीय लोक समता पार्टी केउपेंद्र राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए गए हैं। बाकी पदाधिकारियों का चयन होना बाकी है।
लेकिन यह बात साफ है कि राष्ट्रीय लोक समता पार्टी में जातीय गणित का खास ख्याल रका गया है। जहानाबाद के पूर्व सांसद और कभी नीतीश के करीबी रहे डा. अरुण कुमार अगड़ी जाति से आते हैं, इनके अलावा शंकर झा आजाद, विज्ञान स्वरूप सिंह, संजय वर्मा भी हैं तो पिछड़ी जाति से ही सतीश कुमार आते हैं। पूर्व सांसद अरुण कुमार को पार्टी का बिहार का सूबेदार बना दिया है। अरुण कुमार अगड़ी भूमिहार जाति के हैं। सुधांशु शेखर भास्कर और बिवट पासवान दलित चेहरा है तो मुसलमानों को भी पार्टी ने न सिर्फ साख लिया है बल्कि खासी तरजीह दी है। पूर्व मंत्री डा लुतुफुर रहमान और नूर हसन आजाद पार्टी में काफी सक्रिय हैं। पार्टी का सारा जोर जातिय गणित पर तो है ही, अतिपिछड़ों, महादलितों और मुसलमानों को गोलबंद करने में भी है। माना जारहा है कि राष्ट्रीय और प्रदेश इकाई में इस जातिय संतुलन को बनाए रखा जाएगा। बिहार में अगड़ी जाति लालू यादव से नाराज थी और इस नाराजगी के वजह से कोई और विकल्प नहीं देख कर अगड़ों ने नीतीश् का साथ दिया था। लेकिन नीतीश के राज में भी उन्हें बहुत तवज्जो नहीं मिली, इससे अब अगड़े उनसे भी नाराज हैं। राष्ट्रीय लोक समता पार्टी एक विकल्प के तौर पर उनके सामने है। इसलिए नई पार्टी उन्हें साधने में किसी तरह की कोताही नहीं दिखाएगी। ऐसा माना जा रहा है कि प्रदेश इकाई की कमान या तो किसी अल्पसंख्यक को सौंपी जाएगी या फिर किसी अगड़ी जाति को, ताकि प्रदेश में साफ संदेश जाए।
रैली में आयोजकों ने यह साफ कर दिया कि बिहार में बदलाव की लड़ाई शुरू हो गई है और उसकी अगुआई राष्ट्रीय लोक समता पार्टी करेगी। यह भी इत्तफाक ही है कि इस रैली के आयोजकों में कई चेहरे ऐसे हैं, जो समता पार्टी के निर्माण के समय भी सक्रिय थे। ये चेहरे हैं-उपेंद्र कुशवाहा, अरुण कुमार और सतीश कुमार। यही वजह है कि रैली में जॉर्ज फर्नांडीज की चर्चा भी खूब हुई। यह भी कम दिलचस्प नहींं है कि बरसों पहले जब समता पार्टी का गठन किया गया था, तब नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने की बात कही गई थी और इस बार लोक समता पार्टी के गठन के दौरान नीतीश की तानाशाही प्रवृति के खिलाफ बिुगल फूंका गया और उन्हें सत्ता से बेदखल करने की बात कही गई।
रैली में यह भी साफ हुआ कि राज्य में सत्ता परिवर्तन के लिए नई पार्टी नए दोस्तोंको तलाशेगी। हालांकि अभी यह साफ नहींं हुआ है कि नई पार्टी किन ‘दोस्तों’ का साथ लेगी, लेकिन जो भी होंगे वे ऐसे होंगे उन्हें कुशवाहा के नेतृत्व में विश्वास रखना होगा। वैसे यह जानना भी कम दिलचस्प नहींं है कि भाजपा और जद (एकी) के कम से कम तीन दर्जन विधायकों ने इस नई पार्टी में दिलचस्पी ली है और इस बात का इरादा जाहिर किया है कि अगर उन्हें इस नई पार्टी में सम्मान मिले तो वे नीतीश का साथ छोड़ने के लिए तैयार हैं।
नई पार्टी के लिए यह बात भी महत्त्वपूर्ण थी कि इसमें बिहार के सभी जिलों से लोग आए थे और नीतीश के गृह जिले से भी बड़ी तादाद में लोगों ने इसमें शिरकत की थी।
उधर, नीतीश समर्थक दावा कर रहे हैं कि इक्का-दुक्का नेताओं के साथ छोड़ने से नीतीश पर कोई फर्क नहीं पड़ा। पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव के नतीजे इसके प्रमाण हैं। गौरतलब है कि नीतीश से नाराज होकर दिग्विजय सिंह और राजीव रंजन सिंह जैसे कई नेता अलग हुए थे। दिग्विजय तो बांका में अपना दुर्ग बचाने में सफल हो गए थे पर राजीव रंजन सिंह नीतीश से अलग होकर हाशिए पर चले गए। कुशवाहा नीतीश को अकेले चुनौती देने की चूक नहीं करना चाहते। वे नीतीश से खफा हर छोटे-बड़े नेता को लामबंद करने में जुट गए हैं। राष्ट्रीय लोक समता पार्टी की नजर नीतीश से नाराज अगड़ी जातियों पर भी टिकी हैं। जो अभी भाजपा या कांग्रेस के साथ तो हैं पर लालू और पासवान के साथ कतई जाना नहीं चाहती। लालू से अलग होकर जब जनता दल के नेताओं ने जार्ज फर्नांडिज की अगुवाई में समता पार्टी बनाई थी तो उपेंद्र कुशवाहा भी उसमें अग्रणी थे।
नीतीश जब दूसरी बार सत्ता में आए थे तो उन्होंने दावा किया था कि और कुछ हुआ हो या नहीं पर उनकी सरकार के पहले कार्यकाल में बिहारियों का स्वाभिमान बहाल हुआ है। उन्होंने बिहार से पलायन रोक देने के भी दावे किए थे। पर कुशवाहा के साथी अरुण कुमार का दावा है कि अभी भी लाखों बिहारी रोजगार के लिए सूबे से पलायन कर रहे हैं। कुशवाहा ने अपनी पटना की रैली में उत्तर प्रदेश की विधायक अनु प्रिया पटेल को खासतौर पर बुलाया था। जो उत्तर प्रदेश के कुर्मियों के सबसे असरदार नेता रहे सोनेलाल पटेल की बेटी हैं।
बिहार की राजग सरकार के खिलाफ आयोजित रैली में आम जनता की समस्याओं के प्रति संघर्ष का संकल्प लिया गया। नई पार्टी की प्राथमिकता युवा और किसान होंगे, जबकि इसकी नीतियां सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के आधार पर तय होगी। कुशवाहा ने पार्टी के नाम की घोषणा करते हुए पार्टी का प्रमुख नारा- ‘जय किसान-जय नौजवान, हम सब मिलकर करेंगे बिहार का नवनिर्माण’ भी लोगों के सामने रखा। कुशवाहा का कहना है कि आपातकाल के बाद पहली बार प्रदेश में लोकतंत्र के समक्ष चुनौती आई है। जनतांत्रिक संस्थाएं कमजोर हो गई हैं, राजनीतिक कार्यकर्ता हाशिए पर हैं। अधिकारियों और अपराधियों का बोलबाला है। उन्होंने कहा कि शिक्षा- स्वास्थ्य के क्षेत्र में गिरावट, महादलित, अल्पसंख्यक, अतिपिछड़ों की उपेक्षा हो रही है। वित्त रहित शिक्षा की चर्चा करते हुए कहा कि अनुदान राशि बांटने के नाम पर सभी का शोषण हो रहा है। बेरोजगारी के कारण बड़े पैमाने पर पलायन जारी है। नौजवानों की सबसे बड़ी दुश्मन वतर्मान राज्य सरकार है। उन्होंने कहा कि लोगों की हर समस्या को उनकी पार्टी उठाएगी। अपनी पूरी टीम के साथ अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ेंगे। उन्होंने यह भी साफ किया कि अब भविष्य में वे गलती नहीं करेंगे और नीतीश के साथ नहीं जाएंगे।
पूर्व सांसद अरुण कुमार का कहना है कि पलायन कर 59 लाख बिहारी सूबे से बाहर रह रहे हैं। वे हर साल 16,000 करोड़ रुपए भेजते हैं। यह एक समानांतर अर्थव्यवस्था है। सरकार ने शिक्षा का स्तर पूरी तरह से चौपट कर दिया है। ‘ई-गवर्नेस’ के बदले सूबे में 'इल-गवर्नेस' है। उन्होंने कहा कि हमने नीतीश कुमार को बिठाने (गद्दी पर) में तन-मन-धन लगाया है तो उन्हें उठाने में भी तन-मन-धन लगा देंगे। चाणक्य ने ‘नंद वंश’ के साम्राज्य की समाप्ति के लिए संकल्प लिया, पूरा किया, हम भी इसे दोहराते हैं। रैली में उत्तर प्रदेश की विधायक और परिवर्तन पार्टी की नेता अनुप्रिया पटेल ने भी शिरकत की।
नए राजनीतिक दल के गठन के बाद कयासों का दौर भी शुरू हो गया है खास कर कुशवाहा के नए दोस्तों को लेकर चर्चा आम है। वैसे आम लोगों ने यह सुगबुगाहट है कि अगर पार्टी ने जमीनी स्तर पर काम किया तो वह नीतीश का विकल्प दे सकती है क्योंकि नीतीश के राज में आम लोग बेहाल हैं और कई स्तर पर भ्रष्टाचार के मामले सामने आने के बाद नीतीश का ‘सुशासन’ सवालों के घेरे में है। देखना दिलचस्प होगा कि उपेंद्र कुशवाहा और अरुण कुमार की यह नई पार्टी बिहार में विकल्प के तौर पर उभरती है या नहीं।
उधर, नीतीश के खिलाफ सियासी माहौल को हवा देने में प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू की भूमिका भी है। उन्होंने राज्य में प्रेस की स्वतंत्रता नहीं होने का आरोप लगाकर नीतीश सरकार को नसीहत दी थी। नीतीश के करीबी भी इस आरोप को खारिज नहीं कर पाते कि तमाम अच्छाइयों के बावजूद नीतीश अगर किसी से चिढ़ जाएं तो प्रतिशोध के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं। लोकतंत्र में इस तरह की असहिष्णुता एक नकारात्मक पहलू मानी जाती है। विरोधियों के इस आरोप को नीतीश भी नहीं नकार सकते कि तमाम कोशिशों, प्रचार और दावों के बावजूद अभी तक राज्य में किसी भी औद्योगिक घराने ने निवेश की कोई पहल नहीं की है। ऐसे में सूबे का पिछड़ापन दूर करने के दावे हवाई ही साबित होंगे।
इन सबके बीच ही बिहार में वित रहित और नियोजित शिक्षकों का प्रदर्सन जारी है। पटना में शिक्षकों पर पुलिस के लाठी चलाने को लेकर भी नीतीश की आलोचना हो रही है। नियोजित शिक्षकों को नीतीश ने वोट बैंक के लिए नौकरी पर तो रख लिया लेकिन उनके वेतन मनरोगा मजदूरों से भी कम है। एक ही स्कूल में एक शिक्षक छत्तीस हजार वेतन पा रहा है तो दूसरे शिक्षक को छह हजार तनख्वाह दी जारही है। वेतन की इन विसंगतियों को लेकर ही शिक्षक आंदोलन कर रहे हैं। नीतीश के अधिकार यात्रा के दौरान भी शिक्षकों ने उनका जम कर विरोध किया था। अब इस आंदोलन के जोर पकड़ने से नीतीश की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
Wednesday, November 28, 2012
उतार पर है नीतीश के सुशासन का जादू
फ़ज़ल इमाम मल्लिक
अधिकार यात्रा पर निकले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सांसत में हैं। प्रदेश भर में उनका जिस तरह से विरोध हुआ इससे उनके सुशासन के दावों की कलई खुल गई है। बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के मकसद से उन्होंने यह यात्रा शुरू की थी। इस यात्रा के जरिए वे पार्टी के नवंबर में होने वाली अधिकार रैली की तैयारी में जुटे थे। लेकिन हर जगह उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा। कई जगह उन्हें चप्पलें दिखाई गईं तो कई जगह काले झंडे। अपने विरोध से बौखलाए नीतीश कुमार ने सार्वजनिक सभा में यहां तक कह दिया कि अगर लोकतंत्र पर उन्हें यकीन नहीं होता तो यहां जमा भीड़ प्रदर्शन कर रहे लोगों का क्या हश्र कर देती पता नहीं। वे इतना पर ही नहीं रुके बाहुबलि रणबीर यादव की भी तारीफ की जिन्होंने प्रदर्शन कर रहे लोगों को धमकाने के लिए उनके सामने पुलिस की र्काबाइन छीन कर फाइरिंग कर लोगों को धमकाया। हद तो यह है कि उनकी इस हरकत पर उनके ख्रिलाफ अब तक कोई मुकदमा तक दर्ज नहीं हुआ है। जबकि प्रदर्शन कर रहे शिक्षकों पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर दिया है।
अधिकार यात्रा के दौरान नीतीश जब खगड़िया पहुंचे तो वहां भी नियोजित शिक्षकों का विरोध झेलना पड़ा। तब जद (एकी) विधायक पूनम देवी के पति रणवीर यादव ने पुलिस की कारबाइन कर फाइरगिं की और लोगों को धमकाया। रणबीर यादव भी विधायक रहे थे। वे दबंग और बाहुबलि हैं और अपना दामन साफ रखने के लिए नीतीश कुमार ने उनका टिकट काट कर उनकी पत्नी को टिकट दिया था। वे संदेश देना चाहते थे कि जद (एकी) बाहुबलियों को टिकट देने के खिलाफ है। लेकिन उनकी मंशा साफ थी और खगड़िया में यह देखने को मिला। नीतीश कुमार की मौजूदगी में एक बाहबलि पुलिस से कारबाइन छीन लेता है और उस पर अभी तक कोई कारर्वाई नहीं होती। दिलचस्प बात यह है कि बाहुबलि नेता रणबीर यादव इसे सही ठहरा रहे हैं और ऐसा करते हुए वे भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद वगैरह की मिसाल देते हैं। रणधीर यादव ने कहा कि देश की आजादी के लिए चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह ने हथियार उठाया था और मैंने एक मुख्यमंत्री को बचाने के लिए। उनकी पत्नी और विधायक पूनम पांडेय भी मानती हैं कि भीड़ उग्र थी और वह मुख्यमंत्री की हत्या करना चाहती थी। जद (एकी) के तमाम नेता भी यही हत्या राग को गाते हुए विपक्ष की साजिश करार दे रहे हैं लेकिन ऐसा करते हुए वे यह भूल जाते हैं कि सत्ता नीतीश के हाथ में है। खुफिया तंत्र से लेकर पुलिस और प्रशासन उनकी अपनी है तो फिर सरकार को यह खबर क्यों नहीं हुई कि नीतीश की हत्या की साजिश थी। और बड़ा सवाल यह कि अगर भीड़ उग्र थी तो किसी को भी पुलिस से कारबाइन छीनने का हक किसने दिया है। विपक्ष की साजिश करार देने वाले जद (एकी) नेताओं के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि कुछ जगहों पर तो सरकार में शामिल भाजपा की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्यों ने नीतीश के खिलाफ प्रदशर््न किया। विरोध से तिलमिलाए नीतीश ने अब प्रशासन को यहां तक आदेश दे दिया है कि उनकी सभा में बिना पास के कोई प्रवेश नहीं कर सकता है और न ही उनकी सभा में कोई काली कमीज पहन कर या दोपट्टा ओढ़ कर आए। सभा में काले छाते लाने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है।
दरअसल नीतीश तानाशाही प्रवृति के हैं और प्रदेश में पहली बार उनका विरोध हो रहा है। अब तक उनका सारा सुशासन नारों और भाषणों तक ही रहा है। वे अधिकार यात्रा पर निकले हैं लेकिन जब शिक्षक अपने अधिकार की बात कहते हैं तो नीतीश संयम खोते हैं। बिहार में नियोजित शिक्षकों की तादाद एक लाख से ज्यादा है और उन्हें छह से लेकर आठ हजार रुपए तनख्वाह मिलती है। शिक्षक अपनी तनख्वाह बढ़ाने के साथ-साथ दूसरी सुविधा देने की मांग कर रहे थे और नीतीश को यह पसंद नहीं आया। इसलिए दरभंगा में उन्होंने किसी तानाशाह की तरह एलान कर दिया कि वे उन्हें उनका अधिकार नहीं देंगे।
विपक्ष को नीतीश पर हमला बोलने का मौका मिला है। विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी कहते हैं कि नीतीश के सुशासन की पोल खुल रही है तो वे बौखला रहे हैं। बिहार नवनिर्माण मंच के संयोजक उपेंद्र कुशवाहा कहते हैं कि नीतीश के तौर-तरीकों का सच सामने आ रहा है। वे पार्टी और पार्टी से बाहर भी तानाशाह की तरह पेश आते हैं। मंच के सहसंयोजक शंकर आजाद नीतीश की नीतियों की आलोचना करते हुए कहते हैं कि वे अपने खिलाफ कुछ बी सुनना पसंद नहीं करते हैं और अब तक बिहार के लोगों को भ्रमा कर शासन कर रहे थे। ऐसा नहीं है कि पहली बार उनका इस तरह का विरोध हुआ है। उनके विश्वास और विकास यात्रा के दौरान भी विरोध हुआ था लेकिन मीडिया ने उन पर तवज्जो नहीं दी क्योंकि बिहार में नीतीश ने मीडिया पर अघोषित सेंसर लगा रखा था। बिहार युवक कांग्रेस के अध्यक्ष ललन कुमार ने कहा है कि सरकार के मुखिया ने जिस भाषा का इस्तेमाल किया, उसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है। बिहार में सरकार के खिलाफ लोगों में गुस्सा है और वह गुस्सा नीतीश की सभाओं में सामने आ रहा है। नीतीश पिछले सात-आठ साल से सिर्फ विकास का नारा ही लगाते रहे हैं जमीन पर कुछ भी नहीं हुआ है। जाहिर है कि लोगों का गुस्सा तो फूटना ही था।
बहरहाल इसे लेकर बिहार में राजाीति भी गरमा गई है। जद (एकी) नेताओं के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि नीतीश को मारने की कौन और क्यों साजशि कर रहा है। जद (एकी) ने इसके लिए राजद पर आरोप लगाया है। इस बीच राजद प्रमुख लालू यादव परिवर्तन यात्रा पर निकले हुए हैं। उधर कुशवाहा अपने साथियों के साथ संकल्प यात्रा पर हैं। लालू यादव अपना खोया जनाधार पाने के लिए लोगों के बीच जा रहे हैं। उनके साथ यों तो रामविलास पासवान हैं लेकिन लोक जनशक्ति पार्टी उनकी अगुआई में अलग तरीके से नीतीश के कामकाज का विरोध कर रहा है। विपक्ष के इन हमलों के बीच जद (एकी) और भाजपा अलग-अलग सुर में गा रहे हैं। सूत्रों की मानें तो भाजपा 2014 के लोकसभा चुनाव में सभी चालीस सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सी.पी. ठाकुर ने इसका इजहार भी किया था। भाजपा में यह कवायद करीब साल भर से चल रही है। पार्टी अब नीतीश के शिकंजे से खुद को निकालना चाहती है। हालांकि इससे पहले नीतीश ने भी सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने के संकेत दिए थे।
यों भी भाजपा और जद (एकी) के बीच चल रही तनातनी से नीतीश की परेशानी कम नहीं हो रही है। उन्हें अब जगह-जगह लोगों के विरोध का सामना तो करना ही पड़ रहा है, सरकार में शामिल भाजपा भी उनके कामकाज के तरीकों से नाराज है।भाजपा सांसद ने अपनी ही सरकार पर जम कर निशाना साधा। पूर्णिया के सांसद उदय सिंह के बयान ने खुद उनकी पार्टी को तो सांसत में डाला ही है, जद (एकी) में भी उनके बयान से बेचैनी बढ़ी उदय सिंह ने तीस सितंबर को बिहार सरकार के खिलाफ ‘वेदना प्रदर्शन’ कर नीतीश को जम कर कोसा।
उदय सिंह यहां से दूसरी बार चुन कर संसद पहुंचे हैं। इलाके में वे लोकप्रिय हैं। परिवार के लोग राजनीति और सत्ता से जुड़े रहे हैं। वे राज्यसभा सदस्य एनके सिंह के अनुज हैं। लेकिन उनके सरकार विरोधी प्रदर्शन से हड़कंप है। सिंह ने कहा कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों की दशा में कोई सुधार नहीं हो रहा है। जिन्हें राशन और किरासन मिलना चाहिए, उन्हें नहीं मिल रहा है। इंदिरा आवास हो या मनरेगा, तमाम योजनाओं में लूट और भ्रष्टचार है। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? जानकार बताते हैं कि जद (एकी) के कई सांसद हैं, जिन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके कामकाज पर सवालिया निशान लगाया। लोगों की समस्याओं को सामने रख नीतीश कुमार की सरकार को घेरा। ऐसे सासंदों मेंं राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह, उपेंद्र कुशवाहा, मंगनी लाल मंडल प्रंमुख हैं। ललन सिंह और मंगनी लाल मंडल लोकसभा के सदस्य हैं। उपेंद्र कुशवाहा राज्यसभा के सदस्य हैें। जद (एकी) की ओर से उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की गई। भाजपा सांसद उदय सिंह पहले सांसद हैं, जिन्होेंने पार्टी और सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
भाजपा और जद (एकी) के बीच कटुता लगातार बढ़ रही है। जद (एकी) सांसद कैप्टन जयनाराययण प्रसाद निषाद के ताजा बयान ने आग में घी का काम किया है। निषाद ने भाजपा को मीठा जहर बताते हुए उससे जल्द किनारा कर लेने को नीतीश को कहा है। जाहिर है कि भाजपा में इसकी कड़ी प्रतिक्रिया हुई है। सीपी ठाकुर के साथ-साथ नीतीश सरकार में मंत्री गरिीराज सिंह ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है। राजग के इन दो दलों के बीच जिस तरह से तकरार बढ़ रहा है उससे नए राजनीतिक संदेश भी जाते हैं। फिलहाल इन आरोप-प्रत्यारोपों के बीच सरकार चल रही है और गठबंधन भी। लेकिन यह कब तक चलेगा, निगाहें इस पर रहेंगी क्योंकि भाजपा अगले साल मार्च-अप्रैल में पटना में रैली करने जा रही है और उस रैली में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भी बुलाया जाएगा। मोदी के बिहार आने पर नीतीश की प्रतिक्रिया क्या रहेगी, इस पर भी राजनीतिक विशलेषकों की नजर रहेगी।
Wednesday, November 21, 2012
शर्म उनको मगर नहीं आती !
फ़ज़ल इमाम मल्लिक
वह एक ऐतिहासिक क्षण था। लेकिन वह क्षण बहस-मुबाहसिों में ही खत्म हो गया और इन सबके बीच ही लोकपाल विधेयक कहीं बिला-सा गया। संसद में इतिहास बनना था लेकिन राजनीतिक दलों की नूरा कुश्ती और सांसद के रूप में कुछ विदूषकों की फूहड़ और मसखरेपन की वजह से लोकपाल पर जिस बहस की उम्मीद लगाए पूरा देश बैठा था वह सांसदों के हंसी-मज़ाक़ और अपने को श्रेष्ठ बताने में ही ख़त्म हो गया। भ्रष्टाचार देश में जिस तरह फल-फूल रहा है उसे रोकने के लिए शायद ही किसी सियासी दल ने गंभीरता से संसद में बहस में हिस्सा लिया। कुछ अनजान सांसदों और छोटे दलों ने ज़रूर इसे गंभीरता से लिया और लोकपाल विधेयक के हर पहलू पर चर्चा की। लेकिन अधिकांश दलों ने लोकपाल विधेयक से ज्Þयादा तवज्जो अण्णा हज़ारे को दी। उन्हें कोसने-गरियाने में ही समय ज्Þयादा लगाया। हर कोई अपने को महान बता कर संसद की गरिमा की दुहाई देता रहा। जबकि इसकी क़तई ज़रूरत नहीं थी।
देश के हर नागरिक को संसद के महत्त्व की जानकारी है। लेकिन लोकपाल विधेयक पर चर्चा के दौरान एक तरह से उन्होंने देश के अवाम को बार-बार यह चेताया कि वे कुछ नहीं है जो हैं हम हैं और हमसे ही देश का क़ानून है, संविधान है और देश हम से ही चल रहा है। लेकिन संसद की गरिमा की बात करते वक्Þत एक बात का ज़िक्र किसी ने भी नहीं किया। कर भी नहीं सकते थे। ग़ालिब के शब्दों में कहूं तो वे यह कैसे कह सकते थे कि ‘काबा किस मुंह से जाओगे ग़ालिब’। संसद की गरिमा को सांसदों ने कितना और कब-कब नुक़सान पहुंचाया है, इसे बताने की ज़हमत किसी ने नहीं की। पैसे लेकर सवाल पूछने से लेकर संसद में नोट उछालने का कारनामा तो हमारे इन महान सांसदों ने ही किया है। संसद में एक-दूसरे पर जिस तरह आए दिन छींटाकशी की जाती रही है उसकी नज़ीर भी कम ही मिलती है। सदनों में एक दूसरे को गाली देना, मंत्री से विधेयक की प्रति लेकर फाड़ डालना, एक-दूसरे पर लात-घूंसे चलाना, कुर्सियां फेंकना, माइक तोड़ना अब तो देश में आम बात है। लेकिन वे सांसद-विधयक ठहरे उन्हें हर वह काम करने की छूट है जो आम लोगों के लिए एक तरह से वर्जित होती है। वे चाहे तो ट्रेन रुकवा दें, वे चाहें तो विमान में हंगामा खड़ा कर दें, वे जब चाहें अपनी तनख्वाहें बढ़वा लें, वे चाहें तो पुलिस और प्रशासन को सर के बल खड़ा कर दें, वे चाहें तो किसी को भी ज़लील करें, वे चाहें तो सदन को बंधक बना कर आम लोगों का करोड़ों का नुकसान करें, वे कुछ भी चाह सकते हैं और कुछ भी कर सकते हैं। वे ठहरे सांसद और बाकÞी ठहरे आम लोग जो उन्हें पांच साल के लिए चुन कर संसद-विधानसभा भेजती है लेकिन इन पांच सालों में वे आम लोग अछूत हो जाते हैं और साफ झकझक कपड़े पहने महंगी विदेशी गाड़ियों पर सवार सांसद ख़ास। यह ख़ास ही उन्हें दूसरों से अलग बनाता है। इसलिए लोकपाल विधेयक पर चर्चा के दौरान अण्णा हजÞारे और उनके सहयोगियों पर जिस तरह की टिप्पणियां की गईं वे इसी ख़ास होने के घमंड में की गई।
शरद पवार को चांटा मारने पर संसद एकराय होकर इस घटना की निंदा करती है। दक्षिण-पश्चिम, बाएं-दाएं सारी विचारधाराएं लामबंद होती हैं और एक सांसद या कहें के मंत्री को चांटा मारने के ख़िलाफ़ एक सिरे से निंदा प्रस्ताव पास करती है लेकिन यही नेता-सांसद जब आम आदमी को धमकाते हैं, उसे मारते हैं, उसे प्रताड़ित करते हैं तो संसद में चुप्पी रहती है और फिर बात पार्टी लाइन पर आकर ख़त्म हो जाती है। फिर आम अवाम को सियसात की मंडी महंगाई के तमाचे तो रोज़ जड़ रही है और क्या पक्ष, क्या विपक्ष सिर्फÞ गाल बजा रहे हैं। प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री ‘जादू की छड़ी’ नहीं होने की दलील देते हैं और विपक्ष संसद में सिर्फ़ तमाशा खड़ा करता है। गंभीरता से इस ‘तमाचे’ पर चर्चा तक नहीं करता। संसद का यह विरोधाभास है और सांसदों का यह दोहरा चरित्र। इसलिए लोकपाल विधेयक पर चर्चा के दौरान सांसदों के तेवर उन आम लोगों को लेकर तल्ख़ थे जो भ्रष्टाचार, महंगाई और सरकार की उदार नीतियों से परेशान ही नहीं तंगहाल हैं। उनकी कमाई रोज़ कम होती जा रही है और सांसदों-नेताओं की कमाई रोज़ बढ़ती जा रही है। ऐसा क्यों हो रहा है, इस पर किसी ने सोचने की ज़हमत नहीं की। न तो वामपंथियों ने और न ही दक्षिणपंथियों ने। ग़रीबों की थाली की रोटी भले कम या छोटी होती जा रही हो लेकिन संसद की कैंटीन में महंगाई शर्मिंदा सी एक तरफ़ खड़ी अपने सांसदों को देसी घी में मालपुआ उड़ाते देखती है और फिर परेशान होकर बाहर आकर आम लोगों से उसका निवाला छीनने लगती है। यह सच न तो किसी गुरुदास दासगुप्ता को नज़र आता है और न ही सुषमा स्वराज को। भाषणों और नारों के बीच ही आम आदमी और आम हो जाता है और सांसद, और ख़ास होकर संसद से बाहर आता है। टीवी के कैमरे पर निर्लज्ज और बेशर्म मुस्कराहट के साथ अपनी पीठ थपथपाता है और अपने ख़ास होने के अहसास में थोड़ा और फूल जाता है।
ऐसे चेहरे लोकपाल विधेयक पर बहस के बाद ऐसी ही निर्लज्ज मुस्कान के साथ सदन के साथ बाहर आए थे। कैमरों की चमक में बाइटें देकर कारों में बैठ कर फुर्र हो गए थे। उनके निर्लज्ज चेहरे घमंड से तने थे और उन पर बेशर्मी से लिखी इबारत साफ़ पढ़ी जा सकती थी। वह इबारत साफ़ कह रही थी कि किस माई के लाल में हिम्मत है जो लोकपाल विधेयक लाकर हम सांसदों के भ्रष्टाचार करने के अधिकार को छीन सके। ये चहरे संसद के अंदर तमतमा रहे थे और संसद के बाहर चमचमा रहे थे। इन चेहरों में फ़र्ख़ करना मुश्किल था। बस ऐसा लग रहा था कि हर चेहरा एक जैसा है जिसने लोकतंत्र को ही नहीं इस देश के उन लाखों अवाम की भावनाओं को आहत किया है जो महंगाई और भ्रष्टचार से परेशान है। इन चेहरों में तमीज़ करना मनुश्किल था कि कौन किसका चेहरा है। लालू यादव में मुलायम सिंह का अक्स नज़र आ रहा था और सुषमा स्वराज, सोनिया गांधी जैसी दिख रहीं थीं। लालकृष्ण आडवाणी का चेहरा मनमोहन सिंह जैसा लग रहा था और गुरुदास गुप्ता के चेहरे पर ममता बनर्जी की छाप दिखाई दे रही थी। कई चेहरे, लेकिन हर चेहरा एक-दूसरे से मिलता-जुलता। पार्टियां गौण हो गर्इं थीं और चेहरे टीवी कैमरों की लाइटों में भकभका रहे थे। किसने किसको कोसा, किसने किसकी चापलूसी की, यह संसद में भी दिखा और संसद के बाहर भी। सदन से निकलने वाला हर चेहरा लालू यादव का चेहरा लग रहा था। लालू यादव जिन्होंने सदन में अपने भाषण के दौरान हर आर्थिक भ्रष्टाचार पर अपनी मुहर लगा दी थी। वे हर उस सांसद के जन संपर्क अधिकारी बन गए थे जो नहीं चाहते थे कि लोकपाल विधेयक पास हो और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगे।
अपने भदेसपन और मसख़रेपन के लिए यों लालू यादव जाने जाते हैं, लेकिन संसद में उस दिन उन्होंने जो ‘गंभीर’ और ‘नायाब’ विचार रखे, उसने उनकी कुंठा, निराशा और अहंकार को सबके सामने लाकर रख दिया। पहले राजा-महाराजाओं के यहां विदूषक हुआ करते थे। संसद में इन दिनों यह भूमिका लालू यादव निभा रहे हैं। सरकार में शामिल होने की लपलपाती इच्छा ने उन्हें सोनिया गांधी और कांग्रेस पार्टी के दरबार का विदूषक बना डला है। जो काम कांग्रेस नहीं कर पाई, लालू यादव के ज़रिए उसने करवा डाला। जेपी आंदोलन की कोख से निकले लालू यादव उसी कांग्रेस के साथ गलबंहिया कर रहे हैं, जिस कांग्रेस के ख़िलाफ़ जेपी ने आंदोलन छेड़ा था। बिहार में सत्ता में रहते हुए चारा घोटाले में फंसे और जेल गए लालू यादव संसद में भ्रष्टाचार पर जिस बेशर्मी से बोल रहे थे, वह राजनीति के चेहरे पर कालिख पोत रहा था। राजनीति का यही चेहरा है जिसे बचाने में कांग्रेस ही नहीं सारी पार्टियां लगी हैं। अण्णा हज़ारे को आप गाली देते हैं, दीजिए। अण्णा हज़ारे से जुड़े लोगों पर जुमले कसते हैं, कसें। सड़क पर उतरे लाखों लोगों को आप महज़ भीड़ बताते हैं, बताएं। लेकिन इससे पहले अपने गिरेबान में भी तो झांकें और अपनी क़मीज़ भी तो देखें कि वह कितनी दाग़दार और मैली है। लालू यादव को मुसलमानों की भी ख़ूब फ़िक्र है। लोकपाल विधेयक में वे अल्पसंख्यकों या यों कहें कि मुसलमानों को आरक्षण दिए जाने की पुरज़ोर वकालत कर रहे थे। लेकिन इन्हीं लालू प्रसाद को तब मुसलमानों की सुध नहीं आई जब सात साल पहले बिहार में रामविलास पासवान ने मुसलमान मुख्यमंत्री की शर्त पर उनकी पार्टी को समर्थन देने की बात कही थी। लेकिन तब राबड़ी देवी के नाम पर ही लालू अड़ गए थे। लालू अगर मान गए होते तो बिहार में नीतीश कुमार सत्ता में नहीं आते। लेकिन पार्टी को अपनी बपौती मान बैठे लालू को तब पार्टी में कोई मुसलमान नेता नज़र नहीं आया था। वे सत्ता को अपने पास ही रखना चाहते थे और राबड़ी देवी को हर हाल में मुख्यमंत्री बनवना चाहते थे। नतीजा आज सबके सामने है- न ख़ुदा ही मिला, न विसाले सनम। बिहार में सत्ता से बाहर तो हुए ही, दिल्ली में भी उनकी पूछ कम हुई। मुसलमानों की अनदेखी का नतीजा ही है यह कि लालू आज न सिर्फÞ बिहार में सत्ता से बेदख़ल हुए बल्कि केंद्र में अब वे विदूषक की भूमिका में नज़र आ रहे हैं। तब कांग्रेस लालू के साथ बिहार में ताल से ताल मिलाने का खेल खेल कर रही थी। तब कांग्रेस पार्टी ने दिग्विजय सिंह को बिहार का प्रभारी बना रखा था। आज मुसलमानों की मसीहा बने बैठे ठाकुर दिग्विजय सिंह ने रामविलास पासवान की मांग को अव्यवहारिक कहा था। आज वे मुसलमानों को लुभाने के लिए हर खेल खेल रहे हैं। लेकिन मुसलमानों के लिए किया जा रहा यह सारा तमाशा किसी ‘विधवा विलाप’ से ज्Þयादा कुछ नहीं है।
लोकसभा में भ्रष्टाचार पर लालू प्रसाद यादव को देखते-सुनते हुए यह लग रहा था कि वे उन लोगों की भाषा बोल रहे हैं जो नहीं चाहते हैं कि देश में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सके। कभी लालू मंडल-मसीहा के तौर पर जाने जाते थे। लेकिन आज उनकी भूमिका बदल गई है। वे उनकी हिमायत में खड़े हैं जो देश को लूटने का काम कर रहे हैं। वे बिना किसी लाग-लपेट के उन लोगों के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं जो करोड़ों का भ्रष्टाचार कर रहे हैं। इनमें सियासतदां भी है और नैौकरशाह भी, बिचौलिए भी हैं और बाबुओं की जमात भी। संसद में लोकपाल पर बोलते हुए वे इन लोगों के नायक के तौर पर उभरे। जबकि इससे पहले यही वह तबक़ा था जो उनके गंवई अंदाजÞ पर उनका मज़ाक उड़ाया करता था। लालू यादव ने बिना किसी लाग-लपेट के कहा कि अगर पार्टियों ने विप जारी नहीं किया तो इस विधेयक को पांच फीसद सांसदों का समर्थन भी शायद ही मिले। लेकिन आमतौर पर उनकी बात पर टीका-टिप्पणी करने वाले सांसदों में से किसी ने भी सदन में लालू यादव की इस बत का खंडन करने की कोशिश नहीं की। ज़ाहिर है कि उनका मौन समर्थन उन्हें था और लालू वही बोल रहे थे जो वे चाह रहे थे। लेकिन लोकपाल विधेयक को फांसी घर बोलते हुए लालू यह भूल गए कि संसद से बाहर भी एक दुनिया है। वह दुनिया आम लोगों की दुनिया है, जो हर पांच साल बाद अपनी दुनिया में हर नेता को अपनी शर्तों पर खड़े होने की इजाज़त देता है। अण्णा हज़ारे इसी दुनिया की अगुआई कर रहे हैं। अगले चुनाव में हमें आपका इंतजÞार रहेगा लालू यादव जी।
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